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आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया

Posted On: 3 May, 2011 Others में

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लोकल ट्रेन अपनी धुन में चली जा रही थी | अपनी सीट पर बैठे हिमेश कुछ सोच रहा था | उसके हाथ में एक लेटर था जिसे वह कभी – कभी खोल कर पढ़ लेता था और फिर कुछ सोचने लगता था | आज उसकी नजरें भी ट्रेन पे चिपके उस पोस्टर पर जा जा कर ठहर जाती थी जिसपे लिखा था “घर बैठे कमाइए १२ से १५ हजार ” (ऐसे पोस्टर आपको मुंबई जैसे मेट्रो सिटी में बहुत जगह मिल जाएँगे) | रोज की तरह वह ट्रेन से उतरा और रूम के लिए चल पडा |

हिमेश रूम पे पहुँचा तब उसके हाथ में लेटर देखकर अमरीश पूछ बैठा ” ये तेरे हाथ में क्या है !”

हिमेश ने बड़ी शांति से कहा “वही लव लेटर है , ऑफिस की तरफ से ”

“लव लेटर ! वो भी ऑफिस की तरफ से | मजाक मत कर ला दिखा क्या है ”

“हाँ, हाँ देख ले , तुझे भी ये मिल ही जाएगी १-२ दिन में ” ऐसा कहते हुए हिमेश ने लेटर उसके हाथ में थमा दिया |

(वस्तुतः हिमेश और अमरीश एक ही ऑफिस के दो अलग अलग ब्रांचों में काम करते हैं , और दोनों एक साथ ऑफिस के दिए बैचलर्स रूम में रहते हैं |)

लेटर पढ़कर अमरीश भी थोड़ी देर के लिए शांत हो गया |

“ऐसा कैसे होगा , एक तो हमारी सैलरी कम है , ऊपर से ये इतना पैसा रूम के किराए के तौर पे काट लेंगे , तो फिर हमारे पास बचेगा क्या !”

(वस्तुतः उस लेटर में किराए बढ़ने की बात थी , पहले उन्हें काफी कम किराया देना पड़ता था , सो वो बड़े आराम से मस्ती में रह रहे थे, हालांकि उनकी सैलरी कम थी पर किराया कम कटने की वजह से उन्हें प्रॉब्लम नहीं होती थी )

“यार , हम ये रूम छोड़ देते हैं और कहीं और देखते हैं ”

“तेरे पास डिपोजिट के पैसे हैं , रूम छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं है पर नए रूम के लिए डिपोजिट भी तो भरना पड़ेगा ! ” (हिमेश ने कहा )

(मुंबई जैसे शहर में आपको किराए के रूम में रहने के लिए पहले अच्छी खासी रकम डिपोजिट के तौर पे जमा करनी होती है )

दोनों इस मुद्दे पर सोच विचार कर रहे थे की आखिर वो क्या करें …..

हिमेश ने कहा ” मैंने , कुछ नंबर (मोबाइल के ) नोट किये हैं , पार्ट टाइम जॉब के लिए | मैं सोचता हूँ बात करनी चाहिए ”

अमरीश ने उसकी तरफ देखा “ये सब भी सही नहीं होते हैं, ऐसे ही बोलते कुछ हैं , करवाते कुछ और हैं | तुम जैसा सोच रहे हो उतना आसन नहीं है पार्ट टाइम जॉब करना ”

हिमेश ने कहा “तो फिर क्या करें ”

“कुछ नहीं चल बैठकर टीवी देखते हैं , टेंशन लेने से कुछ नहीं होने वाला | वैसे भी कहते हैं न की ‘चिंता चिता के सामान है ‘ ”

दोनों टीवी देखने बैठ गए | टीवी पर गाना आ रहा था….

“एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में

आबोदाना ढूँढता है , आशियाना ढूँढता है …………….”

दोनों बस शांत बैठे गाने का आनंद ले रहे थे, बिना किसी टेंशन के ………………. !!

— शिवनाथ कुमार —-
http://kumarshivnath.blogspot.com/

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