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यहीं कहीं पर है मेरा गाँव

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                (फोटो गूगल से साभार)

(फोटो गूगल से साभार)


हाँ, जरा रुकना यहाँ
यहीं कहीं पर है मेरा गाँव
एक पीपल का पेड़ होगा बड़ा
बड़े घने हैं जिसके छाँव

एक तालाब है
जहाँ मजे में होंगे कुछ बच्चे
ढूँढना शायद
मिल जाऊँ ‘मैं’ उनमें कहीं

वो ‘हरिया’ होगा
गायों को चराता हुआ
और कुछ बछड़ों
को हाँककर भगाता हुआ
जरा देखना उसे

रुकना देखना
एक ‘आलीशान बँगला’ होगा
गाँव में अकेला खड़ा
सन्नाटों से घिरा
ऊँचाइयों से देखता हुआ
गाँव के छोटे छोटे घरों को

‘सुखिया’ ताई होगी
अपने घर के बाहर
बैठी हुई, भुट्टे जलाती हुई
खेलता हुआ ‘बचपन’
चेहरे पर हर वक्त
‘झुर्रियों’ को छुपाई हुई

‘चौपाल’ लगता है जहाँ
शाम के बाद
जहाँ ‘अब्दुल’ काका
‘हरविंदर’ ताऊ
और कई मिलकर
कुछ तो बजाते मिल जाएँगे
गम की पीठ पर थपथपाते
कुछ गीत गाते मिल जाएँगे

एक झोपड़ा होगा
मिट्टी से लिपी हुई दीवारें होंगी जिसकी
कुछ अजीब सी तस्वीरें बनी हुई
और बाहर दरवाजे पर
एक गाय और उसका बछड़ा होगा
शाम को दीप जलाती
तुलसी चौरा के पास
जहाँ कोई ‘माँ’ होगी
और पास ही खड़ा
एक बच्चा होगा ‘मासूम’ सा
‘आवाज’ लगाना उसे
शायद ‘मैं’ मिल जाऊँ

http://kumarshivnath.blogspot.in/



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
May 15, 2012

शिवनाथ कुमार जी…….आदर्श गाँव का सजीव चित्रण……लेकिन अब सिर्फ कथाओं में ही रह गया है….

    shivnathkumar के द्वारा
    May 16, 2012

    कमेंट्स के लिए धन्यवाद सरिता जी !!

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 15, 2012

शिव नाथ जी, गांव का मनोहारी चित्रण किया है आपने अपनी कविता में. मजा आ गया. बहुत सुन्दर और भावात्मक रचना के लिए बधाई स्वीकार करे. परस्पर सहयोग के लिए आभारी हूँ. बस इसी प्रकार समर्थन लेते रहिये व देते रहिये. आप मेरी अन्य रचनाये जरुर पढियेगा. शायद आपको पसंद आये. और जल्दी से अपने ब्लॉग पर अपना फोटो भी चिपका दीजिये.

    shivnathkumar के द्वारा
    May 16, 2012

    धन्यवाद अंकुर जी !! आपकी रचनाएँ काफी अच्छी होती हैं, समय मिलने पर मैं जरुर पढूँगा …

yamunapathak के द्वारा
May 15, 2012

सच कहूँ तो एकदम जीती जागती तस्वीर उभरी है गाँव की इस कविता में. शुक्रिया

    shivnathkumar के द्वारा
    May 15, 2012

    उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद यमुना जी !!

yogi sarswat के द्वारा
May 14, 2012

एक झोपड़ा होगा मिट्टी से लिपी हुई दीवारें होंगी जिसकी कुछ अजीब सी तस्वीरें बनी हुई और बाहर दरवाजे पर एक गाय और उसका बछड़ा होगा शाम को दीप जलाती तुलसी चौरा के पास जहाँ कोई ‘माँ’ होगी और पास ही खड़ा एक बच्चा होगा ‘मासूम’ सा ‘आवाज’ लगाना उसे शायद ‘मैं’ मिल जाऊँ क्या बात है , बहुत सुन्दर ! अपनी पुराणी यादों को , विस्म्रतियों को ढूँढती रचना ! बहुत सुन्दर शब्द !

    shivnathkumar के द्वारा
    May 15, 2012

    धन्यवाद योगी जी !!


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